Tuesday, August 16, 2016

त्याग का सम्मान

एक कंजूस सेठ था । वह इतना कंजूस था कि अपने ऊपर भी एक ढेला तक खर्च नहीं करता था । लाखों का स्वामी था, किन्तु फटे कपडे पहनता था । उसके अन्दर एक अच्छी बात थी कि वह पास के मन्दिर में जब भी सत्संग होता, वह उसमें अवश्य जाता था । वहाँ उसे कोई नहीं पूछता था । सभी उससे परिचित थे । वह वहाँ सबसे अन्त में जूतों-चप्पलों के पास में बैठ जाता था । कथा-प्रवचन सुनता रहता था ।

एक बार सत्संग का आयोजन हुआ । वह भी उसमें जाने लगा । जब अन्तिम दिवस भेंट चढाने का दिन आया तो सभी कुछ-न-कुछ अपने-अपने घरों से ले आए । वह कंजूस सेठ भी एक मैले रुमाल में बाँधकर कुछ लाया ।सब लोग अपनी-अपनी लाई वस्तु रखते गए, वह सेठ भी आगे बढा । अपना रुमाल खोल दिया । उसमें से चमकती हुईं अशर्फियाँ निकली, एक दो, तीन, चार और कई अशर्फियाँ ।

सभी उसे देखकर भौंचके रह गए । ये क्या हुआ सेठ को । आज के प्रवचन से वह इतना प्रभावित हुआ कि वह अपनी कंजूसी भूल गया । वह वहाँ अशर्फियाँ रखकर जाने लगा । पण्डित जी ने कहा, "नहीं-नहीं सेठ जी, वहाँ नहीं, यहाँ मेरे पास मञ्च पर बैठिए ।"

सेठ जी ने कहा, "यह तो रुपयों का सम्मान है, पण्डित जी । मेरा सम्मान तो नहीं ?"

पण्डित जी ने कहा, "भूलते हो सेठ जी । रुपया तो तुम्हारे पास पहले भी था । यह तुम्हारे रुपए का नहीं, त्याग का सम्मान है ।"

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Contributed by
Mrs Sujata ji

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