Tuesday, August 30, 2016

It's all yours

There was a young monk who was begging from house to house. There came a Rich Person who was super arrogant and egoist. The rich man started giving bad words and abusing the monk for no reasons. The monk was still cool, calm and composed. The rich man got wilder because he thought that the monk will lose his temper. So he started to shout more and give more bad words. Still there was no reaction from the monk. The rich man called him close and then pushed him into the mud. The monk fell and all his belongings scattered. But still the monk did not say anything and was very cool. This perplexed the Rich Man so he called him and asked the secret of the monk’s coolness._
The monk did not reply directly, but asked the rich man who was sitting on the horse. Sir, whose horse is it?
Rich Man: Mine obviously
Monk: If you give me this horse whose will it become?
Rich Man: I do not want to give you the horse but if I give you the horse it will belong to you.
Monk: Good, you want to give but I do not accept the horse, then whose will it become?
Rich Man: If you do not accept the horse it will be mine, obviously.
Monk: You gave me so many Bad Words, I did not accept any. So all of it is yours!
You control 100% of all your emotions, so next time you choose what emotions you would like to have. Your Nature is not built in a day, so every incident will shape your life up.



Contributed by
Mrs Sujata ji 

Monday, August 22, 2016

परमात्मा और पुरुष

मीरा जब वृंदावन पहुंची तो वृंदावन में जो कृष्ण का सबसे प्रमुख मंदिर था, उसका जो पुजारी था, उसने तीस वर्षों से किसी स्त्री को नहीं देखा था। वह बाहर नहीं निकलता था और स्त्रियों को मंदिर में आने की मनाही थी। द्वारपाल थे, जो स्त्रियों को रोक देते थे।

कैसी अजीब दुनिया है! भगवान कृष्ण का भक्त और कृष्ण के मंदिर में स्त्रियों को न घुसने दे! और कृष्ण का जीवन किसी पलायनवादी संन्यासी का जीवन नहीं है, मेरे संन्यासी का जीवन है! सोलह हजार स्त्रियों के बीच यह नृत्य चलता रहा भगवान कृष्ण का!

मगर यह सज्जन जो पुरोहित थे, इनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। प्रतिष्ठा का कुल कारण इतना था कि वे स्त्री को नहीं देखते थे।

हम अजीब बातों को आदर देते हैं! हम मूढूताओं को आदर देते हैं। हम रुग्णताओं को आदर देते हैं। हम विक्षिप्तताओं को आदर देते हैं। हमने कभी किसी सृजनात्मक मूल्य को आदर दिया ही नहीं। हमने यह नहीं कहा कि इस महात्मा ने एक सुंदर मूर्ति बनायी थी, कि एक सुंदर गीत रचा था, कि इसने सुंदर वीणा बजायी थी, कि बांसुरी पर आनंद का राग गाया था। नहीं, यह सब कुछ नहीं; इसने स्त्री नहीं देखी तीस साल तक। बहुत गजब का काम किया था!

मीरा आयी। मीरा तो इस तरह के व्यर्थ के आग्रहों को मानती नहीं थी। फक्कड़ थी। वह नाचती हुई वृंदावन के मंदिर में पहुंच गयी। द्वारपालों को सचेत कर दिया गया था, क्योंकि मंदिर का प्रधान बहुत घबड़ाया हुआ था कि मीरा आयी है, गांव में नाच रही है उसके गीत की खबरें आ रही हैं, उसकी मस्ती की खबरें आ रही हैं,भगवान कृष्ण की भक्त है, जरूर मंदिर आएगी, तो द्वार पर पहरेदार बढ़ा दिये थे।

नंगी तलवारें लिये खड़े थे, कि रोक देना उसे। भीतर प्रवेश करने मत देना। दीवानी है, पागल है, सुनेगी नहीं, जबरदस्ती करनी पड़े तो करना मगर मंदिर में प्रवेश नहीं करने देना।…..

मीरा नाचती गयी। द्वार पर नाचने लगी, भीड़ लग गयी। नाच ऐसा था, ऐसा रस भरा था कि मस्त हो गये द्वारपाल भी भूल ही गये कि रोकना है। तलवारें तो हाथ में रहीं मगर स्मरण न रहा तलवारों का। और मीरा नाचती हुई भीतर प्रवेश कर गयी।

पुजारी पूजा कर रहा था, मीरा को देखकर उसके हाथ से थाल छूट गया पूजा का। झनझनाकर थाल नीचे गिर पड़ा। चिल्लाया क्रोध से ऐ स्त्री, तू भीतर कैसे आयी?

बाहर निकल! मीरा ने जो उत्तर दिया, बड़ा प्यारा है।

मीरा ने कहा, मैंने तो .सुना था

🌹की एक ही पुरुष है-परमात्मा कृष्ण-और हम सब तो उसकी ही सखियां हैं, मगर आज पता चला कि दो पुरुष हैं 🌹

एक तुम भी हो। तो तुम सखी नहीं हो! तुम क्या यह शृंगार किये खड़े हो, निकलो बाहर! इस मंदिर का पुरोहित होने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं। यह पूजा की थाली अच्छा हुआ तुम्हारे हाथ से गिर गयी। यह पूजा की थाली तुम्हारे हाथ में होनी नहीं चाहिए। तुम्हें अभी स्त्री दिखायी पड़ती है ?

तीस साल से स्त्री नहीं देखी तो तुम मुझे पहचान कैसे गये कि यह स्त्री है? :(

और मीरा ने कहा कि यह जो कृष्ण की मूर्ति है, इसके बगल में ही राधा की मूर्ति है—यह स्त्री नहीं है?
और अगर तुम यह कहो कि मूर्ति तो मूर्ति है, तो फिर तुम्हारे कृष्ण की मूर्ति भी बस मूर्ति है, क्यों मूर्खता कर रहे हो?

किसलिए यह पूजा का थाल और यह अर्चना और यह धूप-दीप और यह सब उपद्रव, यह यह सब आडंबर?

और अगरभगवान कृष्ण की मूर्ति मूर्ति नहीं है, तो फिर यह राधा?
राधा पुरुष है ?

तो मेरे आने में क्या अड़चन हो गयी?

मैं सम्हाल लूंगी…..अब इस मंदिर को, तुम रास्ते पर लगो!

मीरा ने ठीक कहा।
जीवन को अगर कोई पलायन करेगा तो परिणाम बुरे होंगे। पराङ्मुख मत होना। जीओ जीवन को, क्योंकि जीने से ही मुक्ति का अपने- आप द्वार खुलता है।

Contributed by
Mrs Seema ji

Tuesday, August 16, 2016

त्याग का सम्मान

एक कंजूस सेठ था । वह इतना कंजूस था कि अपने ऊपर भी एक ढेला तक खर्च नहीं करता था । लाखों का स्वामी था, किन्तु फटे कपडे पहनता था । उसके अन्दर एक अच्छी बात थी कि वह पास के मन्दिर में जब भी सत्संग होता, वह उसमें अवश्य जाता था । वहाँ उसे कोई नहीं पूछता था । सभी उससे परिचित थे । वह वहाँ सबसे अन्त में जूतों-चप्पलों के पास में बैठ जाता था । कथा-प्रवचन सुनता रहता था ।

एक बार सत्संग का आयोजन हुआ । वह भी उसमें जाने लगा । जब अन्तिम दिवस भेंट चढाने का दिन आया तो सभी कुछ-न-कुछ अपने-अपने घरों से ले आए । वह कंजूस सेठ भी एक मैले रुमाल में बाँधकर कुछ लाया ।सब लोग अपनी-अपनी लाई वस्तु रखते गए, वह सेठ भी आगे बढा । अपना रुमाल खोल दिया । उसमें से चमकती हुईं अशर्फियाँ निकली, एक दो, तीन, चार और कई अशर्फियाँ ।

सभी उसे देखकर भौंचके रह गए । ये क्या हुआ सेठ को । आज के प्रवचन से वह इतना प्रभावित हुआ कि वह अपनी कंजूसी भूल गया । वह वहाँ अशर्फियाँ रखकर जाने लगा । पण्डित जी ने कहा, "नहीं-नहीं सेठ जी, वहाँ नहीं, यहाँ मेरे पास मञ्च पर बैठिए ।"

सेठ जी ने कहा, "यह तो रुपयों का सम्मान है, पण्डित जी । मेरा सम्मान तो नहीं ?"

पण्डित जी ने कहा, "भूलते हो सेठ जी । रुपया तो तुम्हारे पास पहले भी था । यह तुम्हारे रुपए का नहीं, त्याग का सम्मान है ।"

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Contributed by
Mrs Sujata ji

Friday, August 12, 2016

The toothpick

I attended a birthday party with a gathering of about 30 people. I sat at the front seat. A lady started distributing food. She started from the back and unfortunately, it didn't get to us sitting at the front.
Another lady started sharing the drinks, she started from the front but unfortunately I had already moved to sit at the back. Again the drink didn't get to me.
I was so furious that I stood up to take my leave but then I saw three ladies each with a big bowl. This time, I tried to be wise by sitting at the middle. One of the ladies started the sharing from the front, the second lady started distributing from the back. The two ladies were sharing fried turkey.
When they got to the middle where I was seated, it got finished again! Feeling so frustrated, I bent my head, putting my face in my hands... but then the third lady tapped me and stretched her bowl for me to pick. I stretched and put my hands inside the bowl... Guess what was in the bowl?
Toothpicks.

Moral: Do not try to position yourself in life, allow God to put you in the right place otherwise you will wrongfully position yourself for toothpicks only.

Contributed by
Mrs Sujata ji

Monday, August 8, 2016

गुरु तत्व

*बात कुछ इस तरह है कि जब श्री रामकृष्ण परमहंस को केंसर हुआ था,तब बीमारी के कारण वे  खाना नही खा पाते थे।*
*स्वामी  विवेकानंद अपने गुरु की इस हालात से बहुत  चिंतित थे।*

*एक दिन परमहंस जी ने पूछा,*

*ठाकुर:"नरेंद्र, क्या तुझे वो दिन याद है,जब तू अपने घर से मेरे पास मंदिर में आता था, तूने दो-दो दिनों से कुछ नहीं खाया होता था। परंतु अपनी माँ से झूठ कह देता था की तूने अपने मित्र के घर खा लिया है,ताकि तेरी गरीब माँ थोड़े बहुत भोजन को तेरेे भाई बहनों को परोस दे। है न ?"*

*नरेन्द्र ने रोते-रोते हां में सर हिला दिया।*

*ठाकुर फिर बोले,"और जब तू यहां मेरे पास मंदिर आता,तो अपने चहरे पर ख़ुशी का मख़ौटा पहन लेता था । लेकिन में भी तो कम नही।झट जान जाता की तेरे पेट में चूहों का पूरा कबीला धमा-चौकड़ी मचा रहा है, की तेरा शरीर क्षुधाग्रस्त है।और फिर तुझे अपने हाथो से* *रसगुल्ला,लड्डू,पेड़े,मख्खन-मिश्री खिलाता था। है ना?"*
*नरेन्द्र ने सुबकते हुए गर्दन हिलाई।*

*अब स्वामी रामकृष्ण फिर से मुस्कराये और पूछा-"कैसे जान लेता था मै यह बात? कभी सोचा है तूने?*
*नरेन्द्र सिर उठाकर परमहंस को देखने लगे।*

*ठाकुर:"बता न, मैं कैसे तेरी आंतरिक स्थिति को जान लेता था ?"*
*नरेन्द्र-"क्योंकि आप अंतर्यामी माँ है,ठाकुर।"*

*ठाकुर:"अंतर्यामी,अंतर्यामी किसे कहते है?"*
*नरेन्द्र-"जो सब के अंदर की जाने"*

*ठाकुर:"कोई अंदर की कब जान सकता है ?"*
*नरेन्द्र-"जब वह स्वयं अंदर में ही विराजमान हो।"*

*ठाकुर:"याने में तेरे अंदर भी बैठा हूँ.....हूँ ?"*
*नरेन्द्र-"जी बिल्कुल। आप मेरे ह्रदय में समाये हुए है।"*

*ठाकुर:"तेरे भीतर में समाकर में हर बात जान लेता हूँ। हर दुःख दर्द पहचान लेता हु।तेरी भूख का अहसास कर लेता हूँ तो क्या तेरी तृप्ति मुझ  तक नही पहुचती होगी ?"*
*नरेन्द्र-"तृप्ति ?"*

*ठाकुर:"हा तृप्ति!जब तू भोजन खाता है और तुझे तृप्ति होती है,क्या वो मुझे तृप्त नही करती होगी ?*

*अरे पगले, गुरु अंतर्यामी है,अंतर्जगत का स्वामी है। वह अपने शिष्यो के भीतर बैठा सबकुछ भोगता है। में एक नहीं हज़ारों मुखो से खाता हूँ।* *तेरे,लाटू के,काली के,गिरीश के,सबके। याद रखना,गुरु कोई बाहर स्थित एक देह भर नहीं है। वह तुम्हारे रोम-रोम का वासी है। तुम्हे पूरी तरह आत्मसात कर चुका है। अलगाव कही है ही नहीं। अगर कल को मेरी यह देह नहीं रही,तब भी जिऊंगा,तेरे जरिए जिऊंगा। में तुझमे रहूँगा,तू  मुझमे।"*

Contributed by
Sh Vineet ji

खाली कुर्सी

एक बेटी ने एक संत से आग्रह किया कि वो घर आकर उसके बीमार पिता से मिलें, प्रार्थना करें...बेटी ने ये भी बताया कि उसके बुजुर्ग पिता पलंग से उठ भी नहीं सकते...

जब संत घर आए तो पिता पलंग पर दो तकियों पर सिर रखकर लेटे हुए थे...

एक खाली कुर्सी पलंग के साथ पड़ी थी...संत ने सोचा कि शायद मेरे आने की वजह से ये कुर्सी यहां पहले से ही रख दी गई...

संत...मुझे लगता है कि आप मेरी ही उम्मीद कर रहे थे...

पिता...नहीं, आप कौन हैं...

संत ने अपना परिचय दिया...और फिर कहा...मुझे ये खाली कुर्सी देखकर लगा कि आप को मेरे आने का आभास था...

पिता...ओह ये बात...खाली कुर्सी...आप...आपको अगर बुरा न लगे तो कृपया कमरे का दरवाज़ा बंद करेंगे...

संत को ये सुनकर थोड़ी हैरत हुई, फिर भी दरवाज़ा बंद कर दिया...

पिता...दरअसल इस खाली कुर्सी का राज़ मैंने किसी को नहीं बताया...अपनी बेटी को भी नहीं...पूरी ज़िंदगी, मैं ये जान नहीं सका कि प्रार्थना कैसे की जाती है...मंदिर जाता था, पुजारी के श्लोक सुनता...वो सिर के ऊपर से गुज़र जाते....कुछ पल्ले नहीं पड़ता था...मैंने फिर प्रार्थना की कोशिश करना छोड़ दिया...लेकिन चार साल पहले मेरा एक दोस्त मिला...उसने मुझे बताया कि प्रार्थना कुछ नहीं भगवान से सीधे संवाद का माध्यम होती है....उसी ने सलाह दी कि एक खाली कुर्सी अपने सामने रखो...फिर विश्वास करो कि वहां भगवान खुद ही विराजमान हैं...अब भगवान से ठीक वैसे ही बात करना शुरू करो, जैसे कि अभी तुम मुझसे कर रहे हो...मैंने ऐसा करके देखा...मुझे बहुत अच्छा लगा...फिर तो मैं रोज़ दो-दो घंटे ऐसा करके देखने लगा...लेकिन ये ध्यान रखता कि मेरी बेटी कभी मुझे ऐसा करते न देख ले...अगर वो देख लेती तो उसका ही नर्वस ब्रेकडाउन हो जाता या वो फिर मुझे साइकाइट्रिस्ट के पास ले जाती...

ये सब सुनकर संत ने बुजुर्ग के लिए प्रार्थना की...सिर पर हाथ रखा और भगवान से बात करने के क्रम को जारी रखने के लिए कहा...संत को उसी दिन दो दिन के लिए शहर से बाहर जाना था...इसलिए विदा लेकर चले गए..

दो दिन बाद बेटी का संत को फोन आया कि उसके पिता की उसी दिन कुछ घंटे बाद मृत्यु हो गई थी, जिस दिन वो आप से मिले थे...

संत ने पूछा कि उन्हें प्राण छोड़ते वक्त कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई...

बेटी ने जवाब दिया...नहीं, मैं जब घर से काम पर जा रही थी तो उन्होंने मुझे बुलाया...मेरा माथा प्यार से चूमा...ये सब करते हुए उनके चेहरे पर ऐसी शांति थी, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी...जब मैं वापस आई तो वो हमेशा के लिए आंखें मूंद चुके थे...लेकिन मैंने एक अजीब सी चीज़ भी देखी...वो ऐसी मुद्रा में थे जैसे कि खाली कुर्सी पर किसी की गोद में अपना सिर झुकाया हो...संत जी, वो क्या था...

ये सुनकर संत की आंखों से आंसू बह निकले...बड़ी मुश्किल से बोल पाए...काश, मैं भी जब दुनिया से जाऊं तो ऐसे ही जाऊं...

Contributed by
Mrs Gunjan ji

Friday, August 5, 2016

Hide and Seek

According to an old Hindu legend, there was a time when all human beings were gods, but they abused their divinity.

So, Brahma, the chief God, decided to take the divinity away from them and hide it somewhere they could never find it.

Brahma called a council of the gods to help him decide where to hide the divinity.
“Let’s bury it deep in the earth,” said the gods. But Brahma answered, “Humans will dig into the earth and find it.”

Some gods suggested, “Let’s sink it in the deepest ocean.” But Brahma said, “No, Human will learn to dive into the ocean and will
find it.”

Then some gods suggested, “Let’s take it to the top of the highest mountain and hide it there.”

Brahma replied, “Human will eventually climb every mountain and take up their divinity.” Then all the gods gave up and said, “We do not know where to hide it, because it
seems that there is no place on earth or ocean that human beings will not eventually reach.”

Brahma thought for a long time said, “We will hide their divinity deep into the center of their own being, Humans will search
for it here and there but they wont look for the divinity inside their true selves”
All the gods agreed that this was the perfect hiding place, and the deed was done.

And since then, humans have been going up and down the earth, digging, diving, climbing, and exploring, searching for something, which already lies within
themselves.

“Divinity lies within us all"

Contributed by
Mrs Shruti Chaabra ji

एक औरत

एक गांव में एक जमींदार था। उसके कई नौकरों में जग्गू भी था। गांव से लगी बस्ती में, बाकी मजदूरों के साथ जग्गू भी अपने पांच लड़कों के साथ रहता था। जग्गू की पत्नी बहुत पहले गुजर गई थी। एक झोंपड़े में वह बच्चों को पाल रहा था। बच्चे बड़े होते गये और जमींदार के घर नौकरी में लगते गये। सब मजदूरों को शाम को मजूरी मिलती। जग्गू और उसके लड़के चना और गुड़ लेते थे। चना भून कर गुड़ के साथ खा लेते थे। बस्ती वालों ने जग्गू को बड़े लड़के की शादी कर देने की सलाह दी। उसकी शादी हो गई और कुछ दिन बाद गौना भी आ गया। उस दिन जग्गू की झोंपड़ी के सामने बड़ी बमचक मची। बहुत लोग इकठ्ठा हुये नई बहू देखने को। फिर धीरे धीरे भीड़ छंटी। आदमी काम पर चले गये। औरतें अपने अपने घर। जाते जाते एक बुढ़िया बहू से कहती गई – पास ही घर है। किसी चीज की जरूरत हो तो संकोच मत करना, आ जाना लेने। सबके जाने के बाद बहू ने घूंघट उठा कर अपनी ससुराल को देखा तो उसका कलेजा मुंह को आ गया।जर्जर सी झोंपड़ी, खूंटी पर टंगी कुछ पोटलियां और झोंपड़ी के बाहर बने छः चूल्हे (जग्गू और उसके सभी बच्चे अलग अलग चना भूनते थे)। बहू का मन हुआ कि उठे और सरपट अपने गांव भाग चले। पर अचानक उसे सोच कर धचका लगा– वहां कौन से नूर गड़े हैं। मां है नहीं। भाई भौजाई के राज में नौकरानी जैसी जिंदगी ही तो गुजारनी होगी। यह सोचते हुये वह बुक्का फाड़ रोने लगी। रोते-रोते थक कर शान्त हुई। मन में कुछ सोचा। पड़ोसन के घर जा कर पूछा – अम्मां एक झाड़ू मिलेगा? बुढ़िया अम्मा ने झाड़ू, गोबर और मिट्टी दी।साथ मेंअपनी पोती को भेज दिया।वापस आ कर बहू ने एक चूल्हा छोड़ बाकी फोड़ दिये।सफाई कर गोबर-मिट्टी से झोंपड़ीऔर दुआर लीपा।फिर उसने सभी पोटलियों के चने
एक साथ किये और अम्मा के घर जा कर चना पीसा।अम्मा ने उसे सागऔर चटनी भी दी। वापस आ कर बहू ने चने के आटे की रोटियां बनाई और इन्तजार करने लगी।जग्गू और उसके लड़के जब लौटे तो एक ही चूल्हा देख भड़क गये।चिल्लाने लगे कि इसने तो आते ही सत्यानाश कर दिया। अपने आदमी का छोड़ बाकी सब का चूल्हा फोड़ दिया। झगड़े की आवाज सुन बहू झोंपड़ी से  निकली। बोली –आप लोग हाथ मुंह धो कर बैठिये, मैं खाना
निकालती हूं। सब अचकचा गये! हाथ मुंह धो कर बैठे। बहू ने पत्तल पर खाना परोसा – रोटी, साग, चटनी। मुद्दत बाद उन्हें ऐसा खाना मिला था। खा कर अपनी अपनी कथरी ले वे सोने चले गये। सुबह काम पर जाते समय बहू ने उन्हें एक एक रोटी और गुड़ दिया।चलते समय जग्गू से उसने पूछा – बाबूजी, मालिक आप लोगों को चना और गुड़ ही देता है क्या? जग्गू ने बताया कि मिलता तो सभी अन्न है पर वे चना-गुड़ ही लेते हैं।आसान रहता है खाने में। बहू ने समझाया कि सब अलग अलग प्रकार का अनाज लिया करें। देवर ने बताया कि उसका काम लकड़ी चीरना है। बहू ने उसे घर के ईंधन के लिये भी कुछ लकड़ी लाने को कहा।बहू सब की मजदूरी के अनाज से एक- एक मुठ्ठी अन्न अलग रखती। उससे बनिये की दुकान से बाकी जरूरत की चीजें लाती। जग्गू की गृहस्थी धड़ल्ले से चल पड़ी। एक दिन सभी भाइयों और बाप ने तालाब की मिट्टी से झोंपड़ी के आगे बाड़ बनाया। बहू के गुण गांव में चर्चित होने लगे।जमींदार तक यह बात पंहुची। वह कभी कभी बस्ती में आया करता था।  आज वह जग्गू के घर उसकी बहू को आशीर्वाद देने आया। बहू ने पैर छू प्रणाम किया तो जमींदार ने उसे एक हार दिया। हार माथे से लगा बहू ने कहा कि मालिक यह हमारे किस काम आयेगा। इससे अच्छा होता कि मालिक हमें चार लाठी जमीन दिये होते झोंपड़ी के दायें - बायें,तो एक कोठरी बन जाती। बहू की चतुराई पर जमींदार हंस पड़ा। बोला –
ठीक, जमीन तो जग्गू को मिलेगी ही। यह हार तो तुम्हारा हुआ।यह कहानी मैरी नानी मुझे सुनाती थीं। फिर हमें सीख देती थीं –औरत चाहे घर को स्वर्ग बना दे, चाहे नर्क! मुझे लगता है कि देश, समाज, और
आदमी को औरत ही गढ़ती है।

Contributed by
Mrs Neena ji